यूएवी

आईएनएएस 342 –फ्लाइंग सेंटीनल्स

INAS 339 – The Falcons

भारतीय नौसेना का दशकों से, प्रतिष्ठित बल के तौर पर उत्‍तरोत्‍तर विकास हुआ है एवं नौसेना ऐतिहासिक क्षणों का हिस्‍सा बनी हुई है। वायु अवयव में वायु स्‍टेशन का अधिष्‍ठापन एक ऐसा क्षण था जब 11 मई 1953 को कोच्चि में पहले वायु स्टेशन, आईएनएस गरुड़ का कमीशन किया गया। हमारी टोही क्षमता को देखते हुए यह शक्ति गरुड़ में भी दोहराई गई जब पूर्णतया क्रांतिकारी अवधारणायुक्‍त, मानव रहित हवाई वाहन को आकाश में प्रक्षेपित किया गया।

शत्रु को खोजना, शत्रु का पता लगाना व उस नजर रखना ही समुद्री युद्ध मूल सिद्धांत है। इस मूल उद्देश्य को पूरा करने के उद्देश्‍य से सेंसर व उनके संवाहक दोनों का तेजी से विकास किया गया है। मानवरहित वायु अवयव को समुद्री टोह में शामिल करना अत्‍याधुनिक संग्राम की ओर बढ़ता हुआ एक और कदम है। इसके रिमोट कंट्रोल परिचालन, कॉकपिट व अन्य आपातकालीन गियर की अनिवार्यता को खत्म करते हैं। इसके आकार को क्रमिक रूप से छोटा करने से परिवर्तनशीलता एवं रडार की पकड़ में न आने की क्षमता बढ़ जाती है। रणक्षेत्र के शत्रुतापूर्ण माहौल में यूएवी, सेंसर-ऑपरेटिंग प्लेटफॉर्म के लिए सबसे अच्‍छा विकल्‍प होता है क्‍योंकि इसके किफायती होने के कारण शांति के समय में इससे अधिक से अधिक खुफिया जानकारी जुटाई जा सकती है। युद्ध से संबंधित प्रौद्योगिकी में वर्तमान प्रवृत्तियों को देखते हुए भारतीय नौसेना ने दिसंबर 2002 में आईएआई मालट से सर्चर एमके द्वितीय एवं बड़ा व अधिक सक्षम हेरोन, दो भिन्‍न-भिन्‍न प्रकार के यूएवी हासिल किये। ये छोटे वायुयान अपनी खोज व जांच से समुद्री लक्ष्‍यों का पता लगाने व उन पर नजर रखने, ओटीएचटी डेटा उपलब्‍ध कराने, एसएआर में सहायता एवं युद्ध में हुई क्षति का आकलन जैसी अनगिनत भूमिकाओं को पूरा करते हैं।

प्रचालकों व अनुरक्षकों को शुरूआती प्रशिक्षण आईएआई मालट, इसराइल में दिया गया था जहां वर्ष 2002 में 16 आंतरिक पायलट, 11 प्रेक्षक, 8 विदेशी पायलट, 06 तकनीकी अधिकारी व 75 तकनीकी व गैर-तकनीकी नौसैनिक सैद्धांतिक कक्षाओं में शामिल हुए थे। तदुपरांत 31 अगस्त, 2002 को आईएनएस गरुड़ में गहन उड़ान एवं परीक्षण इकाई (आईएफटीयू) की स्थापना की गई थी एवं इसे वायुयान की स्‍वीकायर्ता, प्रचालक व तकनीकी क्रू का प्रशिक्षण, वायुयानों व सेंसरों का मूल्यांकन तथा परीक्षण, सिद्धांतों का‍ निरूपण, परिचालन व रखरखाव प्रकिंया से संबंधित कार्य सौंपे गये थे।

इकाई कर्मियों के विशेषज्ञता प्राप्‍त करने के परिणामस्‍वरूप ओईएम से धीरे-धीरे हाथ खींचने के साथ ही जनवरी 2003 में उड़ान भरने के प्रशिक्षण प्रारंभ हुआ। उड़ान के नियमित प्रशिक्षण से प्रचालन शक्ति को बल मिला एवं इकाई ने पोतों एवं विभिन्न सैन्य व गैर-सैन्य हवाई क्षेत्रों से दोनों तटों के स्‍थलेत्‍तर अभ्‍यास में नियमित रूप से भाग लेना शुरू कर दिया।

अनुरक्षकों की आगामी पीढ़ी को नई अर्जित विशेषज्ञता हस्‍तांतरित करने के उद्देश्‍य से ओजेटी प्रकोष्‍ठ ने भी तकनीकी अधिकारियों एवं नौसैनिकों का प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया।

तत्‍कालीन प्रभारी-अधिकारी, कंमाडर राजेश कवात्रा के कमान संभालने के साथ ही 6 जनवरी, 2006 को आईएफटीयू का परिचालनात्‍मक स्क्वाड्रन, आईएनएस 342 के तौर पर औपचारिक रूप से कमीशन किया गया था। आज आईएनएएस 342 ने विमानन क्षेत्र में पूर्ण रूप से अहम कार्यात्मक स्क्वाड्रन के तौर पर नए युग का सूत्रपात किया है एवं किसी भी प्रकार की सामरिक गतिविधि में इसकी मांग की जाती है।

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