नौसेनाध्यक्ष का भाषण - प्रमुख बातें डीआरडीओ के डायरेक्टर कॉन्फ्रेंस में - 15 अक्टूबर 19

नौसेनाध्यक्ष का भाषण - प्रमुख बातें डीआरडीओ के डायरेक्टर कॉन्फ्रेंस में - 15 अक्टूबर 19

(थीम: - 'डीआरडीओ के विकास का रास्ता' पर नौसेना का नजरिया)

नौसेना की ओर से, सबसे पहले मैं डीआरडीओ के समृद्ध योगदान की अभिस्वीकृति देना चाहता हूँ।

डीआरडीओ और भारतीय नौसेना के काफ़ी पुराने और करीबी संबंध ने कई सफल कहानियां बनाई है, जैसे कि
स्वदेशी हथियारों और सेंसर का आरंभ
संयुक्त विकास की सफलता की कहानियां
विकास के अनेक चरणों के तहत बड़ी संख्या में परियोजनाएँ।

इस प्रकार, डीआरडीओ लैब भारतीय नौसेना के लिए महत्वपूर्ण हैं, ताकि उन तकनीकों का रखरखाव किया जा सके जो नौसैनिक युद्धपोत के लिए काफ़ी महत्वपूर्ण हैं।

जब हम युद्धपोत पर चर्चा करते हैं, तो युद्धपोत से जुड़ी तकनीक काफ़ी समानार्थक लगती है। युद्धपोत में काफ़ी तेज़ी से बदलाव आ रहा है और इसमें मुख्य भूमिका तकनीक की है। इसलिए, यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि... तकनीक को अप-टू-डेट रखने पर जोर दिया जाए। इसके अलावा, मैंने जो अभी कहा, वह डीआरडीओ के मिशन कथन में निर्धारित है। मैं कहना चाहूँगा कि
“अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी प्रणालियों और समाधानों से युक्त होकर रक्षा सेवाएं निर्णायक बढ़त प्रदान करें”

इस मिशन कथन के अनुसरण में... कारकों का निर्धारण... दो T से किया जाए।
'समय (Time)' और
‘तकनीक (Technology)’।

'समय'...यह विकास परियोजनाओं का सार है। यह आगे बढ़ने और निष्पादित करने की वह अवधि है…जो उपकरण को बेहतर बनाने और तेजी से आगे ले जाने वाली एकीकृत 'आधुनिक' तकनीकों में मदद कर सकती है।

तकनीकी के संदर्भ में, मैं हमारे माननीय रक्षा मंत्री से वह कहना चाहूंगा, जैसा पहले नहीं कहा गया...
“जब राष्ट्र युद्ध पर जाते हैं, तो बेहतर तकनीक के साथ राष्ट्र जीतेगा।”

भारतीय नौसेना के लिए, सही 'तकनीक' को बनाए रखना महत्वपूर्ण है।
आदर्श रूप से…
20% पोत...में मामूली पुरानी तकनीक है;
60% … आधुनिक तकनीक से युक्त है;
20%…में अत्याधुनिक तकनीक को जोड़ा जा रहा है।
यह अनुपात...आदर्श है...यह सुनिश्चित करने के लिए कि...हम तकनीक प्रबंधन बदलाव में आगे बढ़ रहे हैं।
यहाँ फिर से डीआरडीओ…बल स्तरों के सही मिश्रण का रखरखाव करने के लिए नौसेना की मदद करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

जब हम भविष्य की ओर देखते हैं, हम बलों में... ऐसे आत्मनिर्भर बल बनने का लक्ष्य रखते हैं जो तकनीकी रूप से सशक्त हों...

जिसके लिए हमें तकनीक के ग्राफ़ में लंबी छलांग लगाने की आवश्यकता है...

मेरे तीन सुझाव हैं

पहला
डीआरडीओ के साथ साझेदारी में हमारा उद्देश्य 'आला' तकनीक पर ध्यान केंद्रित करना है।

इस प्रयास में...आला तकनीक कार्यक्षेत्रों के लिए पर्याप्त प्रयासों और धन को मिलाने की आवश्यकता है ।

आयात का प्रतिस्थापन... इसे निजी उद्योग पर छोड़ दें, जो काफ़ी हद तक परिपक्व हो गया है।

दूसरा
मैं सुझाव देना चाहूंगा कि हम यूनाइटेड स्टेट्स के...डीएआरपीए मॉडल... पर एक नज़र डालें
जहां एक केंद्रित टीम है।
पर्याप्त धन के साथ।
सही दिशा-निर्देश प्रदान किया गया है।
और सख्त समय-सीमा दी गई है। हम रक्षा के लिए इस तरह के कुछ अलग नएपन से जुड़ सकते हैं...

तीसरा
तकनीकी केंद्र के रूप में भारत को आगे बढ़ाने के लिए, हमें छोटे-छोटे अन्वेषकों को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है...उनमें से कुछ विदेशी आवश्यकताओं की पूर्ति कर रहे हैं...

डीआरडीओ उन्हें सहयोग दे सकता है और प्रोत्साहित कर सकता है...ये दोनों स्थितियां क्षमता को बढ़ाएंगी: -
डीआरडीओ…बौद्धिक पूंजी…संस्थागत शक्ति…वित्तीय क्षमता …उत्पादन क्षमता ।
अन्वेषकों के विचार के साथ...समय-सीमा पर कार्य पूरा करने के लिए गति और चुस्ती लाई जा सकती है।

समाप्त करते हुए यह कहना चाहूँगा कि हमारी तरफ से…भारतीय नौसेना स्वदेशीकरण और आत्म-निर्भरता के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है।

डीआरडीओ के सहयोग से जो हासिल हुआ है, हमें उस पर गर्व है…
इसके अलावा, हम बहुत भाग्यशाली हैं कि...लक्ष्य को पूरा करने के लिए कई पहल शुरू की गई हैं जो पूरी तरह से "मेक इन इंडिया" के लिए प्रतिबद्ध हैं।
तो, आइए हम इस सुनहरे अवसर का फ़ायदा उठाएं और अपने देश को ऐसी शक्तिशाली नौसेना देने के लिए मिलजुल कर सहयोग करें जो भविष्य के संघर्ष में सुरक्षा दे सके।
सभी पहलों में डीआरडीओ का पूरे दिल से सहयोग करें…

धन्यवाद...जय हिंद!

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